पुराने समय में जब आज की तरह कैलेंडर और घड़ियाँ हर हाथ में नहीं थीं, तब प्रकृति के ये रंग ही त्योहारों की सूचना देते थे। पलाश का खिलना “वसंत के चरम” और “होली के आगमन” का उद्घोष था।

प्लास फूल (जिसे टेसू भी कहा जाता है) केवल प्रकृति की सुंदरता ही नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन के सबसे जीवंत प्रतीक हैं।
पलाश के फूलों का हमारे सांस्कृतिक और प्राकृतिक इतिहास में विशेष महत्व रहा है
उग्रसेन पाल
एमसीबी जिले के गोदरी पारा के घाट के भुक- भुकी मैं चारों तरफ पलाश के फुलों से जंगल का दृश्य मनमोहक हो गया है । वही बात करे प्राचीन काल से ही जब जंगलों में पलाश के पेड़ केसरिया फूलों से लद जाते थे, तो यह इस बात का प्राकृतिक संकेत होता था कि फागुन आ गया है और होली की दस्तक होने वाली है।
पलाश और होली का गहरा नाता
पलाश के फूलों का हमारे सांस्कृतिक और प्राकृतिक इतिहास में विशेष महत्व रहा है:

प्राकृतिक कैलेंडर: पुराने समय में जब आज की तरह कैलेंडर और घड़ियाँ हर हाथ में नहीं थीं, तब प्रकृति के ये रंग ही त्योहारों की सूचना देते थे। पलाश का खिलना “वसंत के चरम” और “होली के आगमन” का उद्घोष था।
शुद्ध और औषधीय रंग: प्राचीन काल में पलाश के फूलों को उबालकर जो रंग बनाया जाता था, वह त्वचा के लिए बेहद लाभकारी होता था। यह लू और गर्मी से बचाने के साथ-साथ त्वचा के विकारों को भी दूर करता था।
केसरिया फागुन: पलाश के फूलों को ‘जंगल की आग’ (Flame of the Forest) भी कहा जाता है। जब पूरा जंगल केसरिया हो जाता था, तो वह दृश्य ही उत्सव जैसा उमंग भर देता था।
वर्तमान में बदलाव
आजकल रसायनों (Chemicals) वाले रंगों ने पलाश की जगह ले ली है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है, बल्कि हमारी प्राचीन परंपराएँ भी पीछे छूट रही हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में लोग फिर से ‘इको-फ्रेंडली होली’ की ओर मुड़ रहे हैं और पलाश के फूलों से बने प्राकृतिक रंगों का महत्व फिर से समझ रहे हैं।
एक रोचक तथ्य: पलाश का फूल उत्तर प्रदेश का ‘राज्य पुष्प’ भी है और इसे सुंदरता व सात्विकता का प्रतीक माना जाता है।





