जहाँ पूरी दुनिया कैलेंडर के हिसाब से होली मनाती है, वहीं यहाँ के ग्रामीण अपनी मान्यताओं और “अनहोनी” के डर ग्राम पंचायत मनसुख अमरपुर,और कुंदर गढ़ गांव में 7 दिन पूर्व होली मनाने का रिवाज

अनहोनी का डर और प्राचीन मान्यता
इन गांवों में यह मान्यता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है कि यदि निर्धारित समय (7 दिन पूर्व) पर होली नहीं मनाई गई, तो गांव पर कोई बड़ी विपत्ति या दैवीय प्रकोप आ सकता है
उग्रसेन पाल
कोरिया। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के मनसुख, अमरपुर और कुदरगढ़ जैसे गांवों की यह परंपरा वाकई अद्भुत और थोड़ी रहस्यमयी भी है। जहाँ पूरी दुनिया कैलेंडर के हिसाब से होली मनाती है, वहीं यहाँ के ग्रामीण अपनी मान्यताओं और “अनहोनी” के डर के कारण समय से पहले ही रंगों में सराबोर हो जाते हैं।
यहाँ इस अनोखी परंपरा के पीछे के मुख्य कारण दिए गए हैं:
1. अनहोनी का डर और प्राचीन मान्यता
इन गांवों में यह मान्यता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है कि यदि निर्धारित समय (7 दिन पूर्व) पर होली नहीं मनाई गई, तो गांव पर कोई बड़ी विपत्ति या दैवीय प्रकोप आ सकता है। ग्रामीणों का मानना है कि अतीत में जब कभी उन्होंने मुख्य तिथि पर होली मनाने की कोशिश की, तो गांव में बीमारियाँ फैलीं या पशुधन की हानि हुई।
2. कुदरगढ़ी माता के प्रति आस्था
कोरिया और सूरजपुर क्षेत्र में कुदरगढ़ी माता का गहरा प्रभाव है। लोक कथाओं के अनुसार, इन गांवों के पूर्वजों को किसी समय ऐसा धार्मिक आदेश या संकेत मिला था कि उन्हें मुख्य होली से पहले उत्सव संपन्न कर लेना चाहिए। इसे माता की इच्छा मानकर आज भी पूरी श्रद्धा से निभाया जाता है।
3. परंपरा का स्वरूप
* होलिका दहन: मुख्य होली से ठीक एक सप्ताह पहले यहाँ होलिका दहन कर दिया जाता है।
* रंगों का उत्सव: दहन के अगले दिन ग्रामीण एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं।
* शांति का वातावरण: जब बाकी दुनिया होली मना रही होती है, तब इन गांवों में शांति रहती है और लोग अपने सामान्य कार्यों में व्यस्त रहते हैं।
> एक दिलचस्प पहलू: यह केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि इन गांवों की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। यह दिखाता है कि कैसे ग्रामीण अंचलों में आज भी मौखिक परंपराएं और लोक मान्यताएं आधुनिक कैलेंडर से ज्यादा मजबूत हैं।





